Moharram Special Article | A Guide

विश्व ने अगणित दुखदायी व आत्मा को झकझोरने वाली घटनाएं और मातम करने वालों के आंसुओं के दरिया बहते देखे होंगे। मगर इतिहास के किसी भी दौर में मनुष्य ने इतने अधिक आंसू न बहाए होंगे और मातम न किया होगा, जितना कि करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर हुआ!

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नबी के प्यारे हजरत इमाम हुसैन का जन्म इस्लामी कैलेंडर के अनुसार तीन शाबान चार हिजरी (8 जनवरी, 626) सोमवार को हुआ था। हुसैन की मां रसूल-ए-मकबूल हजरत मुहम्मद की सबसे प्यारी बेटी हजरत फातिमा थीं। आपके पिता का नाम हजरत अली था। 
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हजरत मुहम्मद ने ही आपका पालन-पोषण किया था। हदीसों से ज्ञात होता कि रसूलल्लाह हजरत मुहम्मद को अपने नवासे इमाम हुसैन से बड़ा स्नेह था। एक बार की बात है कि हजरत फातिमा के घर के आगे से हजरत मुहम्मद का गुजरना हुआ। इमाम हुसैन के रोने की आवाज आई। 
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आप फौरन हजरत फातिमा के पास गये और कहा, ‘बेटी, तू इस बच्चे को रुला कर मुझे दुख देती है।' इतना प्यार था हमारे रसूल को अपने नवासे से। 
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इसी प्रकार एक बार की बात है कि हजरत मुहम्मद साहबा-ए-कराम के बीच में बैठे थे तो उन्होंने कहा, ‘हुसैन मुझसे है, मैं हुसैन से हूं। ऐ खुदा जो हुसैन को दोस्त रखता है, तू उसे दोस्त रख। जिसने मुझसे मुहब्बत की, उसने खुदा से मुहब्बत की।
हजरत इमाम हुसैन अपने नाना व साहाबा-ए-कराम के संरक्षण में पले-बढ़े और इसी प्रकार के समाज में रहे। इसीलिए हजरत इमाम हुसैन के अंदर वही विशेषताएं आ गई थीं, जो उनके नाना में थीं। सच बोलना, निडर रहना, इंसाफ पसंदी, मनुष्यता, धैर्य, सच्चाई, सहनशक्ति आदि विशेषताएं हजरत इमाम हुसैन में थीं, जिसके कारण उन्होंने यजीद और उसके साथियों का अंतिम सांस तक मुकाबला किया। आने वाली नस्लों के लिए हुसैन और उनके परिवार का बलिदान परम बलिदान बन गया।
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मुहर्रम में बलिदान की याद ताजा की जाती है। मास मुहर्रम की पहली से दसवीं तिथि (दसवीं को हुसैन शहीद हुए) तक नौ दिनों को अशरा-ए-मुहर्रम कहते हैं। दसवीं को आशूरा कहते हैं। तमाम विश्व के मुसलमान हुसैन की शहादत को याद करने के लिए जुलूस निकालते हैं। 
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इसके अतिरिक्त मजलिसें भी की जाती हैं। हजरत इमाम हुसैन को याद करने के लिये स्वयं को कष्ट दिया जाता है। लोग बयान सुनते हैं और रोते हैं। मुहिब्बान-ए-हुसैन (हुसैन से प्यार करने वाले) अपना सर और सीना पीटते हैं।
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इसके अतिरिक्त याद-ए-हुसैन में रंग-बिरंगे ताजिये भी निकाले जाते हैं, जिनको अस्र की नमाज के समय (जिस समय हुसैन को शहीद किया गया) अपने-अपने नगर की करबला के मैदान में दफना दिया जाता है।
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करबला का सबक: करबला ने हमें सिखाया है कि जीवन चंद रोज का ही है और असल जीवन तो आखिरत (मृत्योपरान्त) में ही प्रारम्भ होता है। 
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भगवान की बात को मानना परम धर्म है और सदा हक, सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे शत्रु कितना ही मजबूत क्यों न हो। खुद में इतनी सहनशीलता लाओ कि शत्रु वार करते-करते थक जाए। 
अपने हक की रक्षा के लिए किसी भी बलिदान के लिए तैयार रहो। जिल्लत के जीवन से इज्जत की मृत्यु अच्छी है।

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