शोषितों की आवाज भीमराव अंबेडकर को आज ही मिला था भारत रत्न, जीवनभर लड़ते रहे हक की लड़ाई

शोषितों की आवाज बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को आज ही के दिन भारत रत्न मिला था. वह जीवनभर हक की लड़ाई लड़ते रहे और उन्होंने हमारे संविधान के निर्माण में अहम योगदान दिया.



नई दिल्ली: साल के 365 दिन इतिहास में किसी न किसी खास वजह से दर्ज है. आज 31 मार्च का दिन भी ऐतिहासिक है. आज ही दे दिन देश के संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर को 1990 को मरणोपरांत सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. ऐसा कर के देश और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान को नमन किया गया. 'बाबासाहब' भीमराव आंबेडकर ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था और जीवनभर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ लड़ते रहे. आजादी के बाद उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई जब उन्हें राष्ट्र के संविधान निर्माण का दायित्व सौंपा गया.


अंबेडकर ने अपने जीवन में समाज से विभेद हटाने को अपना लक्ष्य बना लिया था और इसकी पूर्ति करने के लिए उन्होंने पढ़ाई को हथियार बनाया. बाबा साहेब बचपन से पढ़ाई में अव्वल आते थे और इसी का नतीजा था कि साल 1912 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में ऑनर्स करने के बाद वो आगे की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका चले गए. अंबेडकर की विदेश में पढ़ाई का खर्चा बड़ौदा के शासक ने उठाया था. यहां पढ़ाई करने के बाद बाबा साहेब ने साल 1921 में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से पढ़ाई पूरी की.

अंबेडकर ने पढ़ाई पूरी करने के बाद तमाम छात्रों की तरह नौकरी शुरू की, लेकिन बचपन में सामाजिक विभेद मिटाने की ली गई प्रतिज्ञा बार-बार उनके सीने में टीस मारती. इसी सबके बीच एक दिन उन्होंने सबकुछ छोड़ दिया और सामाजिक आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने 1936 में लेबर पार्टी का गठन किया. इससे पहले भी वह विभिन्न सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व करते आ रहे थे.

बाद में जब यह तय हो गया कि देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद होगा तो संविधान बनाने की अहम जिम्मेदारी उन्हें उनकी बुद्धिमत्ता के कारण मिली. उन्होंने उस समय भारत के लिए ऐसा संविधान बनाया जो समाज के हर वर्ग को बराबर सम्मान और आवाज देता है. देश के आजाद होने के बाद वह भारत के पहले कानून मंत्री बने. अंबेडकर के जीवन में एक बड़ी घटना साल 1956 में घटी तब उन्होंने हजारों लोगों के साथ बौद्ध धर्म को अपना लिया था. अंबेडकर की मृत्यु उसी साल हो गई और उन्हें मरणोपरांत साल 1990 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से उन्हें नवाजा गया.

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